आज सहसा कलम फूट रो पड़ी ,
लिया खुद लपेट मेरी उँगलियों को अपनी चारो ओर ,
फफक के पुरे हक से मुझे कहा "" बस "
और मत घोंटो अपने जज्बातों का दम ,
क्या हुआ गर तुम्हारी कहानी एक सिलसिला न बन सकी ,
झूठी कल्पना ही सही ,आखिर कुछ लिखो तो कभी,
एक पाती ,एक ,कविता एक छंद ,एक पंक्ति ;
कुछ भी तो लिखो अभी ;
बहुत हुआ ,अब बर्दाश्त नहीं होता,
तुम्हारा मुझे अकेली रातो में आगोश में लेना,
और, बिना पन्ने स्याह किये
खुद में उलझे हुए मुझे वापस रख देना ,
न मेरे लिए ,न उसके लिए ;
कभी खुद के लिए ही सही ,
कुछ लिखो तो कभी ....
अपने ख्यालो के रंग शब्दों में तो कभी ..
मैं , सुनता रहा ;वो जिद करती रही,
आकाश में नक्षत्र भी नृत्य करते रहे,
फिर उन्ही ख्यालों का ,सवालों का ..
रेला ज़हन में शोर करने लगा ,
हाथ फिर बढ़ चलें ,टटोलते ,
किसी सादे पन्ने की तलाश में ...
घुमड़ रही थी हृदय में इतनी यादें ,
ख्याल,ख्वाब ,आवाज़ ,अदा ,अरमान ,दर्द ;
की लिखूं तो हर रिक्तियां रक्त से भरे।
लेकिन मजबूर था ; मर्ज़ मेरा ,दर्द मेरा ;
उस निश्छल,निर्विकार उजले कागज़ का क्या कुसूर ,
की उसे भी खुद के दर्द से बोझिल करूँ ...
रख उस उदास कलम को लेट गया मैं,
खिड़की के बाहर दमकते चाँद को देखते,
खो गया फिर उस ठहरे हुए वक़्त में,
जब कोई छत पर चाँद देखने बुलाता था...
-अभिजीत आनंद 'जीत '
28/09/12